अफगान मददगारों को मुसीबत में नहीं छोड़ेगा US: तालिबान के आतंकी हत्या न कर दें, इसलिए सेना की मदद करने वालों को साथ ले जाएगा अमेरिका

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10 घंटे पहले

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करीब 2 दशक तक अफगानिस्तान में रहकर तालिबान के खिलाफ लड़ने के बाद अमेरिकी सैनिक वापस लौट रहे हैं। -फाइल फोटो

अपने सैनिकों के साथ अमेरिका अफगानिस्तान से उन लोगों को भी बाहर निकालेगा, जिन्होंने तालिबान से जंग लड़ने में अमेरिकी सैनिकों की मदद की है। हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं किया गया है कि ऐसे अफगानी लोगों की संख्या कितनी होगी?

अफगानिस्तान पिछले कई सालों से हिंसा के दौर से गुजर रहा है। इन दिनों यहां से अमेरिकी सैनिकों की ‘घर वापसी’ जारी है। तालिबान से लड़ने में अमेरिकी सैनिकों की मदद करने वाले अफगानी नागरिक अब चिंतित हैं कि यूएस के जाने के बाद तालिबानी उनका क्या हाल करेंगे। इन लोगों को मजबूरी में या तो तालिबान जॉइन करना पड़ेगा या तालिबान के लड़ाके उनकी बेरहमी से हत्या कर देंगे।

इन लोगों को दुविधा से निकालने के लिए अब अमेरिका आगे आया है। अमेरिका के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि जो लोग पहले से ही विशेष अप्रवासी वीजा ( SIVs) पाने की प्रक्रिया में हैं, उनके लिए अफगानिस्तान से उड़ानें जुलाई के आखिरी हफ्ते में शुरू हो जाएंगी।

अफगान सैनिक देश की रक्षा करने में सक्षम: US अधिकारी
अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक राष्ट्रपति जो बाइडेन के निर्देश पर इच्छुक और योग्य अफगानी मूल के लोगों को रिलोकेट करने के लिए ऑपरेशन शुरू किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को विश्वास है कि अफगानिस्तान के सशस्त्र बलों के पास अपने देश की रक्षा करने के लिए टूल्स और कैपेसिटी है।

अगस्त तक लौट जाएंगे अमेरिकी सैनिक
करीब 2 दशक तक अफगानिस्तान में रह रहे अमेरिकी सैनिकों की वापसी जारी है। यूएस सेंट्रल कमांड ने इसी हफ्ते बताया था कि करीब 95% सैनिक US लौट चुके हैं। वो अगस्त तक पूरी तरह से अपने देश लौट जाएंगे।

अफगानिस्तान और तालिबान के बीच बातचीत फेल
तालिबान के लड़ाकों ने पूरे अफगानिस्तान पर फिर से कब्जा करने की कोशिशें तेज कर दी हैं। तालिबान का दावा है कि 85 फीसदी देश में उनका कब्जा हो चुका है। हालांकि, अफगानिस्तान सरकार और तालिबानी विद्रोहियों के बीच बातचीत भी जारी है। समस्या यह है कि एक तरफ विद्रोही गुट जहां टेबल पर बातचीत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके लड़ाके सीमाई इलाकों को कब्जे में ले रहे हैं। माना जा रहा है कि दोहा में हो रही शांति वार्ता काफी हद तक फेल हो चुकी है। तालिबान अब पूरी तरह से बंदूक की नोक पर अफगानिस्तान पर अपना शासन चलाना चाहता है।

376 जिलों में से 150 में तालिबान से लड़ाई जारी
अफगान सेना के जवान 376 जिलों में से 150 में तालिबान से लड़ रहे हैं। देश का एक-तिहाई हिस्सा सक्रिय लड़ाई में है। अकेले अप्रैल 2021 से देश में दो लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं, जिसमें करीब 4,000 लोग मारे गए हैं। विद्रोहियों ने हाल के दिनों में उत्तरी अफगानिस्तान के अधिकांश हिस्सों में कब्जा जमा लिया है। हालांकि, तालिबान का कहना है कि वो शहरों के अंदर सरकार से लड़ना नहीं चाहते।

क्या और कैसा है तालिबान?

  • 1979 से 1989 तक अफगानिस्तान पर सोवियत संघ का शासन रहा। अमेरिका, पाकिस्तान और अरब देश अफगान लड़ाकों (मुजाहिदीन) को पैसा और हथियार देते रहे।
  • सोवियत सेनाओं ने अफगानिस्तान छोड़ा तो मुजाहिदीन गुट एक बैनर तले आ गए। इसको नाम दिया गया तालिबान। हालांकि, तालिबान कई गुटों में बंट चुका है।
  • तालिबान में 90% पश्तून कबायली लोग हैं। इनमें से ज्यादातर का ताल्लुक पाकिस्तान के मदरसों से है। पश्तो भाषा में तालिबान का अर्थ होता हैं छात्र या स्टूडेंट।
  • पश्चिमी और उत्तरी पाकिस्तान में भी काफी पश्तून हैं। अमेरिका और पश्चिमी देश इन्हें अफगान तालिबान और पाकिस्तान तालिबान के तौर पर बांटकर देखते हैं।
  • 1996 से 2001 तक अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत रही। इस दौरान दुनिया के सिर्फ 3 देशों ने इसकी सरकार को मान्यता देने का जोखिम उठाया था। ये तीनों ही देश सुन्नी बहुल इस्लामिक गणराज्य थे। इनके नाम हैं- सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और पाकिस्तान।

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