ऑनलाइन गेम्स के साइड इफेक्ट: ऑनलाइन गेम कंपनियां बच्चों को लत लगाती हैं, फिर खर्च के लिए मनौवैज्ञानिक दबाव डालती हैं, पैरेंट्स को लग रही लाखों की चपत

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लंदनएक घंटा पहले

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बेटे के साथ डॉ. मुर्तजा ।

ब्रिटेन के एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. मुहम्मद मुर्तजा के सात साल के बेटे आशाज़ ने उनसे गेम खेलने के लिए मोबाइल मांगा तो उन्होंने खुशी-खुशी दे दिया। पर एक घंटे बाद पता चला कि गेम खेलने के दौरान उनके अकाउंट से 1.35 लाख रुपए जा चुके हैं। जब ई-मेल रिसिप्ट देखीं तो पता चला कि बेटे ने ऑनलाइन गेम पर यह खर्च किया था। वह लगातार खेलते रहने की उत्सुकतावश गेम पर्चेसिंग पर क्लिक करता रहा।

वह इस बात से अनजान था कि हर क्लिक 250 से 10 हजार रु. की पड़ेगी। डॉ. मुर्तजा कहते हैं तीन बच्चों की देखभाल में आमदनी का 40% खर्च हो जाता हो तो ज्यादा बचत नहीं होती। क्रेडिट कार्ड का सहारा लेना पड़ता है। पर इस खेल की लत ने पूरा बैलेंस खत्म कर दिया। बहुत कोशिश पर भी 21 हजार रिफंड मिले। मुझे एक कार बेचनी पड़ा।

तुर्की की सूजी ब्रेयर (63) के बेटे माइकेल ने दो दिन में ही जिंदगीभर की बचत के 3.10 लाख रुपए गेम खेलने में गंवा दिए। माइकल को सेरेब्रल पाल्सी समेत कई बीमारियां है, इसलिए उसे व्यस्त रखना होता है। 10 माह की मेहनत के बाद सूजी रिफंड लेने में कामयाब रहीं। अभी भी वे 85 हजार के एक अन्य रिफंड के लिए संघर्ष कर रही हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसे हजारों पैरेंट्स हैं जो बच्चों की गलतियों की सजा भुगत रहे हैं। पता इसलिए नहीं चलता, क्योंकि वे इसकी शिकायत नहीं करते।

3-4 साल के 50% बच्चों के पास टैबलेट, 20 में से एक के पास स्मार्टफोन

डिजिटल फैमिली लाइफ में विशेषज्ञता रखने वाले संगठन पैरेंट्स जोन के सीईओ विकी शोबोल्ट कहते हैं कि ऑनलाइन गेम कंपनियां डार्क नज तकनीकों के जरिए बच्चों पर खर्च करने के लिए मनोवैज्ञानिक दबाव डालती हंै। संगठन की स्टडी में पता चला है कि आधे से ज्यादा बच्चों को पैसा खर्च करके ऑनलाइन खेलना मजेदार लगता है। पिछले साल 90% बच्चों ने डिवाइस पर ऑनलाइन गेम खेले। ब्रिटेन में 3-4 साल के 50% बच्चों के पास टैब है। ब्रिटेन की गेमिंग इंडस्ट्री के 2018 में 10 हजार करोड़ से बढ़कर 2020 में 72 हजार करोड़ होने की ये बड़ी वजह है।

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