जुनूनी पत्रकारिता ही थी दानिश की जिंदगी: अफगानिस्तान में सेना के साथ मिशन पर जाते थे दानिश सिद्दीकी, कोरोना के पीक में भी घर पर नहीं बैठे

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नई दिल्ली23 मिनट पहले

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दानिश पिछले कई दिनों से तालिबान के कब्जे वाले कंधार में रिपोर्टिंग कर रहे थे। संघर्ष के दौरान ही उनकी जान गई।

भारत के सीनियर फोटो जर्नलिस्ट दानिश सिद्दीकी की अफगानिस्तान में सुरक्षा बलों और तालिबान लड़ाकों के बीच संघर्ष में मौत हो गई है। वो समाचार एजेंसी रॉयटर्स के पत्रकार थे। पुलित्जर पुरस्कार विजेता पत्रकार सिद्दीकी अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स के चीफ फोटोग्राफर थे और पिछले कुछ दिनों से अफगानिस्तान में जारी संघर्ष और तनाव को कवर कर रहे थे।

सिद्दीकी अपने ट्विटर अकाउंट पर पिछले कई दिनों से लगातार अफगानिस्तान के हालात के बता रहे थे। उन्होंने वहां से कई कई तस्वीरें और वीडियो शेयर किए। इन्हें देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो कितना चुनौती भरा काम कर रहे थे। इससे पत्रकारिता के लिए उनके जुनून का पता चलता है।

कई बार मौत करीब से छूकर गई थी
अफगान सेना के साथ सिद्दीकी ने बतौर पत्रकार कई मिशनों में हिस्सा लिया। कई बार तो उनकी जान जाते-जाते बची। आखिरकार, उनकी मौत कंधार के स्पिन बोल्डाक जिले में संघर्ष को कवर करने के दौरान ही हुई। इस तरह दुनिया ने एक जुनूनी और साहसी पत्रकार को खो दिया।

सिद्दीकी ने ट्विटर पर 13 जुलाई को एक वीडियो पोस्ट की थी। इसमें वो अफगान स्पेशल फोर्सेस की गाड़ी में बैठे नजर आ रहे हैं। उनका कैमरा ऑन था। इसी दौरान तालिबानियों ने रॉकेट लॉन्चर से गाड़ी पर हमला किया। वो जिस गाड़ी में थे, वो तो बच गई लेकिन बाकी 3 गाड़ियां तबाह हो गईं।

अफगानिस्तान में रिपोर्टिंग करते हुए दानिश के साथ कई बार घातक हादसे हुए, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा। (सौजन्य-रायटर्स)

अफगानिस्तान में रिपोर्टिंग करते हुए दानिश के साथ कई बार घातक हादसे हुए, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा। (सौजन्य-रायटर्स)

युद्ध जैसे हालात में की पत्रकारिता, नहीं टूटा हौसला
अफगानिस्तान में रिपोर्टिंग करते हुए इस तरह की घटनाएं दानिश के साथ कई बार हुईं, लेकिन उनका हौसला नहीं तोड़ पाईं। सिद्दीकी के पिता प्रोफेसर अख्तर सिद्दिकी ने भास्कर को बताया कि बेटे के पैशन को देखकर ही हमने उसे अफगानिस्तान जाने से नहीं रोका। उन्होंने बताया कि दानिश अपने काम को लेकर बेहद संजीदा थे। प्रोफेशन के आगे वह किसी की भी बात नहीं सुनते थे। उन्हें चैलेंज लेना पसंद था।

दानिश की कई सारी तस्वीरें, वीडियो और रिपोर्ट्स रायटर्स की वेबसाइट पर मौजूद हैं। हाल के दिनों में वो अपनी पत्रकारिता के जरिए युद्ध जैसे हालात से गुजर रहे देश का हाल बता रहे थे। वो खुद अफगान सेना के साथ मिशनों पर जाते थे और बिना रुके घंटों काम में लगे रहते थे।

13 जुलाई को दानिश ने ऐसी ही एक तस्वीर ट्वीट की। इसमें वो सुरक्षाबलों के साथ घास के मैदान पर आराम करते नजर आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि 15 घंटे तक लगातार मिशन पर रहने के बाद 15 मिनट के आराम का मौका मिला है। इससे पता चलता है कि दानिश का काम कितना मुश्किल भरा था।

सिद्दिकी की यह फोटो अफगानिस्तान के कंधार में ली गई थी। इसे उन्होंने 13 जुलाई को सोशल मीडिया पर शेयर किया था। (सौजन्य-रायटर्स)

सिद्दिकी की यह फोटो अफगानिस्तान के कंधार में ली गई थी। इसे उन्होंने 13 जुलाई को सोशल मीडिया पर शेयर किया था। (सौजन्य-रायटर्स)

कोरोना की दूसरी लहर के पीक के दौरान भी घर नहीं बैठे
दानिश की पत्रकारिता महज वार रिपोर्टिंग तक ही सीमित नहीं थी। मई-जून में जब भारत में कोरोना की दूसरी लहर अपने पीक पर थी, उस समय वो भारत में ही थे। वो देश के दूर-दराज के इलाकों से रिपोर्ट कर रहे थे। वो दिखा रहे थे कि गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं का कितना बुरा हाल है। लोगों को कोरोना टेस्ट कराने और मेडिकल ऑक्सीजन हासिल करने में कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

कोरोना काल में सार्वजनिक जगहों पर जाना किसी के लिए भी खतरे से खाली नहीं था। इस दौरान भी भारत से लगातार रिपोर्टिंग करते रहे। उन्होंने अपनी तस्वीरों और रिपोर्ट्स से दिखाया कि देश का हेल्थ सिस्टम कितना लचर हो चुका है। अस्पतालों में मरीजों के लिए बेड खाली नहीं हैं। ऑक्सीजन के बिना पीड़ितों की मौत हो रही है। श्मशान घाटों पर लाशों की कतारें लगी हुई हैं। लोग रो रहे हैं, चीख रहे हैं, लेकिन कोई रास्ता नहीं सूझ रहा।

यह कहने की जरूरत नहीं कि दानिश जब भारत में कोरोना से मची तबाही दुनिया को दिखा रहे थे, उस समय खुद उनकी जान भी दांव पर लगी रही होगी। कोरोना काल में इस तरह की पत्रकारिता जुनून और काम के प्रति प्यार के बिना नहीं हो सकती थी।

दानिश ने तस्वीरों में दिखाया कि श्मशान घाटों पर लाशों की कतारें लगी हुई हैं। नदियों के किनारे शव दफनाए जा रहे हैं। (सौजन्य-रायटर्स)

दानिश ने तस्वीरों में दिखाया कि श्मशान घाटों पर लाशों की कतारें लगी हुई हैं। नदियों के किनारे शव दफनाए जा रहे हैं। (सौजन्य-रायटर्स)

भारत में चल रहे किसान आंदोलन को लगातार करते रहे कवर
भारत में चल रहे किसान आंदोलन को वो नवंबर, 2020 से ही वो लगातार कवर करते रहे। उन्होंने अपनी रिपोर्ट्स के जरिए दिखाया कि नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों में किस हद तक नाराजगी है। किसान आंदोलन में पुरुषों के साथ ही महिलाएं और बच्चे भी बढ़-चढकर हिस्सा ले रहे हैं। कड़ाके की ठंड में चल रहे प्रदर्शन के दौरान किसानों को कितनी मुश्किलें झेलनी पड़ रही हैं।

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