भगवान जगन्नाथ रथयात्रा आज: लगातार दूसरे साल भक्त बिना जगन्नाथ परिक्रमा, तीन अलग रथ से सोशल डिस्टेंसिंग, अणसर से क्वारेंटाइन का संदेश

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पुरी12 मिनट पहले

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पुरी मंदिर के मुख्य पुजारी जनार्दन पट्‌टाजोशी महापात्र ने बताया कोराेनाकाल के संदर्भ में रथयात्रा का महत्व

पुरी में कहावत है ‘12 महीने 13 पर्व’। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां परंपराओं का बेहद समर्पित भाव से पालन होता है। कोरोनाकाल के चलते सोमवार को लगातार दूसरे साल बिना श्रद्धालुओं के प्रभु जगन्नाथ की 3 किमी की यात्रा निकलेगी। मंदिर के मुख्य पुजारी जनार्दन पट्‌टाजोशी महापात्र के मुताबिक रथयात्रा के लिए हर साल नए रथों का निर्माण होता है। तैयारी बसंत पंचमी को काष्ठ संग्रह से और रथ निर्माण अक्षय तृतीया से होता है।

इसी दिन भगवान जगन्नाथ की 21 दिन की चंदन यात्रा शुरू होती है। इस दौरान स्नान पूर्णिमा को जगन्नाथजी, बलभद्र व सुभद्रा का 108 कलश से स्नान कराया जाता है। ऐसा होने पर तीनों बीमार पड़ जाते हैं तो उन्हें एकांत कक्ष (क्वारेंटाइन) में रखा जाता है। अगले 15 दिनों तक महाप्रभु को छप्पन भोग न लगाकर फलाहार व औषधियों का भोग लगाया जाता है। अमावस को जगन्नाथजी स्वस्थ हो जाते हैं और रथयात्रा के एक दिन पहले उनके नवयौवन दर्शन भक्तों को कराए जाते हैं। इसे नेत्र दर्शन भी कहा जाता है।

सोमवार सुबह मंगला आरती के साथ ही विधिपूर्वक रथयात्रा शुरू हो जाएगी। सोना पटालागी, पोहंडी विजे की विधि होगी। सोना पटालागी वह नीति है, जिसमें तीनों भाई-बहन के शरीर पर रेशम की डोरी बांध दी जाती है ताकि मंदिर से रथ में ले जाने के दौरान उन्हें कोई चोट न लगे। मंदिर से निकलने के पहले महाप्रभु को फूलों का मुकुट पहनाया जाता है, जिसे ताहिया कहते हैं।

रथ पर सवार होने के बाद पुरी के महाराज जो जगन्नाथ जी के प्रथम सेवक हैं, छेरा पोंहरा की विधि करेंगे। इस विधि में वे रथ के सिंहासन के चारों ओर के गलियारे को स्वर्णजड़ित झाड़ू से बुहारेंगे। सैकड़ों साल से यह रीत स्वच्छता (सेनिटेशन) का संदेश देती आई है। तीनों भाई-बहन तीन अलग रथों में जाते हैं। सदियों से चली आ रही यह परंपरा दो गज दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) का संदेश देती रही है।

21 जुलाई को महाप्रभु स्वर्णाभूषण पहनकर दर्शन देंगे, विसर्जन पर रथ की लकड़ियां दानदाताओं को देंगे
पुजारी जनार्दन पट्‌टाजोशी महापात्र ने बताया कि 21 जुलाई को महाप्रभु रथ पर स्वर्णाभूषण धारण कर दर्शन देंगे। जब मंदिर में प्रवेश करने लगेंगे तो बलभद्र, सुभद्रा व सुदर्शन को मंदिर में प्रवेश मिलेगा, लेकिन लक्ष्मी प्रतिनिधि सेवायत जगन्नाथ का रास्ता रोक लेंगे। तब दोनों के प्रतिनिधियों के बीच नोंकझोंक होगी। अंत में भगवान जगन्नाथ लक्ष्मी को मना लेंगे। रथयात्रा संपन्न होने पर रथ का विसर्जन कर दिया जा जाता है।

रथ में इस्तेमाल सामग्री स्वयं नष्ट (बायोडिग्रेेडेबल) होने वाली हैं। इन लकड़ियों को पूजा कार्य छोड़कर अन्य ईश्वरीय कार्यों में इस्तेमाल किया जाता है। कुछ हिस्से को मंदिर के रसोई घर में इस्तेमाल करते हैं या मंदिर के बड़े दानदाताओं को रथ के हिस्से जैसे चक्का, सिंहासन, छत्र व मूर्तियां आदि दे दी जाती हैं।

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